रविवार, 13 मार्च 2016

मुश्किल काम

(आज मेरे घर एक वरिष्ठ मित्र आये, अपने संपादकत्व में गोरखपुर का साहित्येतिहास तैयार करा रहे हैं। उनसे पहले उनके एक सहयोगी लेखक आये थे, कोई सहयोग नहीं कर सका था, उलटे मुझसे अनजाने में दुखी होकर लौटे। आज आये वरिष्ठ मित्र से कई बार निवेदन किया कि मेरी रुचि नाम-इनाम और इतिहास में तनिक भी नहीं है।  वे माने नहीं, कहा कि बाद में लोग प्रश्न करेंगे कि आपका जिक्र क्यों नहीं है। बहरहाल, उनसे कहा कि फिर मेरे बारे में दो-चार लाइन कुछ भी लिख दीजियेगा, बस। बातें बहुत हुईं, विश्वनाथ जी समेत यहाँ के तमाम लेखकों के बारे में। वे मिलनसार हैं, यहां के लेखकों से काफी घुले-मिले हुए हैं। उन्हें बताया कि मैं यहाँ के लेखकों के साथ खुद को सहज नहीं पाता हूं। कहीं भी और कभी भी अपना नाम क्यों नहीं उनके साथ देखना चाहता हूँ, यह बताने के लिए उन्हें अपनी कविता “ मुश्किल काम “ सुनाना चाहता था, पर उस  वक्त ढ़ूँढ़, नहीं पाया था। अब मिल गयी है, साझा कर रहा हूँ)

मुश्किल काम 
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गणेश पाण्डेय

यह कोई मुश्किल काम न था
मैं भी मिला सकता था हाथ उस खबीस से
ये तो हाथ थे कि मेरे साथ तो थे पर आजाद थे।
मैं भी जा सकता था वहाँ-वहाँ
जहाँ-जहाँ जाता था अक्सर वह धड़ल्ले से
ये तो मेरे पैर थे
जो मेरे साथ तो थे पर किसी के गुलाम न थे।
मैं भी उन-उन जगहों पर मत्था टेक सकता था
ये तो कोई रंजिश थी अतिप्रचीन
वैसी जगहों और ऐसे मत्थों के बीच।
मैं भी छपवा सकता था पत्रों में नाम
ये तो मेरा नाम था कमबख्त जिसने इन्कार किया
उस खबीस के साथ छपने से
और फिर इसमें उस अखबार का क्या
जिसे छपना था सबके लिए और बिकना था सबसे।
मैं भी उसके साथ थोड़ी-सी पी सकता था
ये तो मेरी तबीयत थी जो आगे-आगे चलती थी
अक्सर उसी ने टोका मुझे-‘पीना और शैतान के संग’
यों यह सब कतई कोई मुश्किल काम न था।

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