शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

फुलझड़ी जैसी हँसी का एक पवित्र फूल

- गणेश पाण्डेय

साठ के पास पहुँचते-पहुँचते प्रेम की अंतःसलिला बाहर से बहुत शांत दिखने लगती है या कह सकते हैं कि जीवन के पारिवारिक दायित्व के बीच अवकाश ढ़ूँढते-ढ़ूँढते मद्धिम हो जाती है। उसका हहराता हुआ वेग थम-सा जाता है। यह अलग बात है कि आत्मा के एकांत में प्रेम का मौन माउथआर्गन जब-तब बजता रहता है। कई मौके ऐसे आते हैं, जैसे आज, हमारे भीतर के सितार के तार को छेड़ने के लिए।
‘‘मेरे लिए प्रेम 
बिल्कुल निजी घटना है 
आत्मा का एकांत आलाप
अभिव्यक्ति के सारे दरवाजे बंद हैं जहां 
बस एक अद्वितीय अनुभव है
प्रौढ़ता का एक शालीन विस्फोट
जिसने मेरे प्रेम को 
त्वचा की अभेद्य सतह को भेदकर
भीतर कहीं गहराई में पहुंचा दिया है
शायद मेरे लिए प्रेम
एकांत में किसी फूल से मिलना है।’’ (जापानी बुखार )

      दरअसल इस दिन का अर्थ बूढ़ों के लिए कितना खास हो सकता है और किस तरह, इसे इस बात से अनुभव कर सकते हैं कि एक बूढ़ा इस दिन अपनी जीवनसंगिनी से कहता है कि आज एक फूल मेरी ओर से और भद्र महिला बड़े सम्मान के साथ अपनी फुलझड़ी जैसी हँसी का एक पवित्र फूल वापस कर देती हैं। इससे अधिक अब और क्या हो सकता है। उम्र की ढ़लान पर। शायद यह छोटी-सी हँसी-खुशी  ही अब हमारी जिम्मेदारियों के बोझ से हमें कुछ देर के लिए मुक्त करती है। अच्छा है कि पर्व और इस बहाने मिलने वाले अवसर हमें क्षणभर के लिए ही सही थोड़ा अलग से जी लेने का स्पेस देते हैं।
    हम जिस उम्र और समाज में हैं, बहुत-सी सि़्त्रयाँ अपने बच्चों के लिए घर से बाहर निकलती हैं। ये खरीदना है, वो खरीदना है, इसके लिए यह करना है, उसके लिए वह करना है। बच्चों के साथ उनके जन्मदिन या अन्य अवसर जैसे दिन पर बाहर निकल पाती हैं। सच तो यह कि पुरुष पैसा कमाने की मशीन है तो सामान्य सि़्त्रयाँ घर का पहिया हैं, नींव हैं, साँस हैं, धड़कन हैं और धरती हैं। अपनी साँस को उसकी लय को घर की लय में विलीन कर देना कोई इनसे सीखे। मैं जब भी अपनी जीवनसंगिनी के बारे में सोचता हूँ तो अपने को बहुत कम पाता हूँ। पैसा तो कोई डाँड़ीमार भी कमा लेता है, पर घर को बनाने का काम स्त्री ही करती है।
‘‘एक स्त्री थी
जो दिनरात खटती थी
सूर्य देवता से पहले
चलना शुरू करती थी
पवन देवता से पहले 
दौड़ पड़ती थी हाथ में झाड़ू लेकर
बच्चों के जागने से पहले
दूध का गिलास लेकर
खड़ी हो जाती थी
मुस्तैदी से
अखबार से भी पहले
चाय की प्याली 
रख जाती थी
मेरे होठों के पास
मीठे गन्ने से भी मीठी
यह तुम थी 
मेरे घर की रसोई में 
सुबह-शाम
सूखी लकड़ी जैसी जलती
यह तुम थी!
बावर्ची
धोबी
दर्जी
पेंटर 
टीचर 
खजांची
राजगीर 
सेविका
और दाई
क्या नहीं थी तुम!
यह तुम थी! 
क्या हुआ
जो इस जन्म में
मेरी प्रेमिका नहीं थी
क्या पता
मेरे हजार जन्मों की
प्रेयसी
तुम्हारे अंतस्तल में
छुपी बैठी हो
और तुम्हें खबर न हो
यह कैसी उलझन थी
मेरे भीतर कई युगों से
यह तुम थी
अपने को 
मेरे और पास लाती थी 
करती थी
मेरे गुनाहों की अनदेखी
मेरे खेतों में अपने गीतों के संग
पोछीटा मार कर रोपाई करती हुई 
मजदूरनी कौन थी! 
अपनी हमजोलियों के साथ
हंसी-ठिठोली के बीच 
बड़े मन से मेरे खेतों में
एक-एक खर-पतवार 
ढूंढ-ढूंढ कर निराई करती हुई
यह तन्वंगी कौन थी!
मेरे जीवन के भट्ठे पर
पिछले तीस साल से
ईंट पकाती हुई
झाँवाँ जैसी
यह स्त्री कौन थी
यह तुम थी! 
जिससे 
मेरी छोटी-सी दुनिया में
गौरैया की चोंच में
अंटने भर का 
उसके पंख पर फैलने भर का
एक छोटा-सा जीवन था
एक छोटी-सी खिड़की थी जहां मैं खड़ा था
सुप्रभात का एक छोटा-सा
दृश्यखंड था
यह तुम थी!
मेरे गुनाहों की देवी! 
मुझे मेरे गुनाहों की सजा दो
चाहे अपनी करुणा में
सजा लो मुझे
अपनी लाल बिन्दी की तरह 
अपने अंधेरे में भासमान
इस उजास का क्या करूं 
जो तुमसे है
इस उम्मीद का क्या करूं
आत्मा की आवाज का क्या करूं
अतीत का क्या करूं
अपने आज का क्या करूं
जिसके संग लिए सात फेरे
मेरे सात जन्म के फेरे हैं
जो मेरी आत्मा की चिरसंगिनी थी
मेरा अंतिम ठौर है
यह तुम थी! 
यह तुम हो!! 
मेरी मीता
मेरी परिणीता।’’ (परिणीता)

       मैं बूढ़ों की बात कर रहा हूँ। कह रहा हूँ कि यह दिन अपने जीवन साथी से सिर्फ ‘‘ प्रेम है’’ कहने का नहीं है। अपनी चूकों और गलतियों के लिए माफी माँगने का भी है। यह सिर्फ बूढ़ो ंही नहीं युवाओं के लिए भी अपनी कमियों के सुधार और परिष्कार का दिन भी है।
        आमतौर पर साधारण भारतीय परिवार के वरिष्ठ जनों के लिए इस दिन का वह अर्थ उस रूप में नहीं है, युवा इसे जिस रूप में लेते हैं। सिर्फ मिलकर निकटता का अनुभव करना ही इसका उद्देश्य नहीं होना चाहिए, इसे उच्चतर भावभूमि पर आत्माओं की मैत्री का रंग भी देना चाहिए। अच्छा हो कि हम आज के दिन अपनी एक-एक बुराइयों को तजने का व्रत लें। अपने मित्रों से झूठ न बोलने और उनके विश्वास
को ठेस न पहुँचाने का व्रत लें। मुझे यह कहने में संकोच नहीं कि पान-तम्बाकू जैसे किसी भी नशे से दूर करने में मेरी श्रीमती जी की बहुत रचनात्मक भूमिका है। मुझे याद है जब मैंने शुरू में पान-तम्बाकू छोड़ा था तो लिखने-पड़ने का काम करने में काफी दिक्कत होती थी। कविता सूझती ही नहीं थी। तब मेरी पत्नी ने सम्बल का काम किया। अनगिनत चाय की कप में अपना न जाने कितना प्रेम मिलाया है कि मुझे फिर कभी पान’तम्बाकू की जरूरत ही नहीं पड़ी। कविताएँ, कहानियाँ, उपन्यास , आलोचना, किस क्षेत्र में यहाँ पान-तम्बाकू खाने वाले लेखकों से कम काम किया है ? आज सिर्फ फूल देने और लेने का दिन नहीं है, अपने साथियों से सीख लेने और देने का दिन भी है। उनके महत्व को स्वीकार करने का भी दिन है। आभार व्यक्त करने का दिन है।
    सच्चा प्रेम मनुष्य को बड़ा बनाता है। उसके भीतर शक्ति का संचार करता है। उसे कमजोर होने से बचाता है। उसे माँजता है। उसे चमकाता हैं। बड़े से बड़े संघर्ष में उसका साथ देता हैं। जब जमाना खिलाफ होता है तो उसका प्रेम ही उसका साथ देता है। आज कहने का मन है कि यहाँ  मैंने जो लंबी लड़ाइयाँ की हैं, घर के किसी अँधेरे कोने में बहुत चुप रहा हूँ, उस भयानक एकांत में मेरी श्रीमती का बल मेरे साथ नहीं रहा होता तो मैं आज इस रूप में आपके सामने नहीं होता। जल्द ही आलोचना पर केंद्रित मेरी आने वाली किताब की पाण्डुलिपि को तैयार करने के लिए बराबर टोकती रहीं कि कब बना रहे हैं। घर और बच्चों को संभालने में बड़ी भूमिका उनकी ही रही है। शायद तभी मैं कुछ समाज के लिए रच पाया, कुछ कर पाया। कहना जरूरी है कि उन्होंने मुझ अकिंचन से जीवन में लिया बहुत कम और दिया बहुत। यह उदाहरण भी मुझे उन्होंने ही दिया कि प्रेम में सिर्फ पाना ही नहीं होता है, देना भी होता है।
       आज बच्चों के पास अपने बुजुर्गों को देने के लिए वक्त बहुत कम होता हैं, उन्हें अपनी दुनिया से अवकाश मिले तब तो। सबसे सुंदर स्वप्न के अद्वितीय रथ पर सवार होकर मेरे अंचल, मेरे समाज और देशभर के बच्चो तुम प्रेम के जिस महाकाश में विचरण कर रहे हो जरा नीचे देखो, किस तरह माँ तुम्हारे लिए आँचल फैलाये खड़ी है-
‘‘मेरे जैसे किसी गुमनाम 
कवि के जीवन की कविता से
इस बूढ़ी स्त्री का
चित्र निकाल कर
ले जाओ
और
मिलाओ इसे
उस बूढ़ी स्त्री से
जिसे तुम जानते तो हो
पर तुम्हारे पास जिसके लिए 
वक्त सबसे कम है
जाओ 
उस मां के पास जाओ 
जिसने दी है तुम्हें 
अपनी लोहे जैसी जवानी
गला कर 
कुंदन जैसी यह तरुणाई...’’(परिणीता) 
      प्रेम  के सातवें आसमान पर भी पहुँचकर अपनी उस माँ की अनदेखी मत करना, जिसे तुम्हारा बूढ़ा पिता बहुत-बहुत प्रेम करता है।                                                                                                                                                                                                                           

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