बुधवार, 31 जुलाई 2013

प्रेमचंद और हमारा समय

- गणेश पाण्डेय

     आज प्रेमचंद के स्मरण का अर्थ सिर्फ कथापितामह का परचम लहराना है या उनके साहित्यिक और जीवन मूल्यों की अनदेखी करते हुए उनकी कृतियों पर केंद्रित कोई औपचारिक लेख लिखना है तो मित्रो मैं यह काम करने से रहा। मेरे लिए साहित्य के वे पुरखे जिन्होंने अशर्फियों और इनाम इत्यादि के लिए लेखन नहीं किया है, बल्कि देश और समाज के लिए अपनी ड्यूटी पूरी की है, सचमुच श्रद्धा के केंद्र हैं। जाहिर है कि प्रेमचंद उनमें से एक हैं। आज का समय श्रद्धा के मामले में बेढ़ंगा है। बेढ़ंगा इस अर्थ में कि आज साहित्य में श्रद्धा सिर्फ पुरस्कार और प्रमोशन इत्यादि के लिए दिखती है, वह भी असली नहीं होती। काम निकलते ही श्रद्धा को श्राद्ध में बदलते देर नहीं लगती है। यों आज प्रेमचंद का नाम ले-ले कर अपने को रोशनी में लाने के लिए विकल लेखक कम नहीं हैं, पर प्रेमचंद के साहित्यक मूल्यों को जीने वाले बहुत कम मिलेंगे। उस लेखक संघ में भी कम ही मिलेंगे जिसके अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए 1936 में प्रेमचंद ने कहा था कि ‘‘प्रगतिशील लेखक संघ’, यह नाम ही मेरे विचार से गलत है। साहित्यकार या कलाकार स्वभावतः प्रगतिशील होता है। अगर उसका यह स्वभाव न होता तो शायद वह साहित्यकार ही न होता। उसे अपने अन्दर भी एक कमी महसूस होती है और बाहर भी। इसी कमी को पूरा करने के लिए उसकी आत्मा बेचैन रहती है। अपन कल्पना में वह व्यक्ति और समाज को सुख और स्वछंदता की जिस अवस्था में देखना चाहता, वह उसे दिखाई नहीं देती। इसलिए, वह वर्तमान मानसिक और सामाजिक अवस्थाओं से उसका दिल कुढ़ता रहता है। वह इन अप्रिय अवस्थाओं का अन्त कर देना चाहता है, जिससे दुनिया जीने और मरने के लिए इससे अधिक अच्छा स्थान हो जाय।’’ प्रेमचंद की दृष्टि में लेखक वह है जिसके भीतर इस दुनिया जीने और मरने के लिए और अधिक अच्छा बनाने की बेचैनी हो, लेकिन क्या सचमुच आज के लेखक के भीतर भी यह बेचैनी है या बेचैनी का दिखावा है ? क्या हम अपने भीतर साध्य की पवित्रता के बिना मंजिल तक पहुँच सकते हैं ? प्रेमचंद अपने इसी प्रसिद्ध लेख/भाषण में यह भी कहते हैं कि साहित्य जीवन की आलोचना है। मैथ्यू आर्नाल्ड ने भी कविता को जीवन की आलोचना कहा है। जहाँ तक मैं समझ पाता हूँ, प्रेमचंद विचार की आलोचना नहीं, जीवन की आलोचना इसलिए कहते हैं कि निरा विचार की आलोचना ज्ञान और सामाजिकविज्ञान के दूसरे अनुशासनों की चीज है। वह साहित्य को जीवन की आलोचना इसलिए कहते हैं कि साहित्य संवेदना का व्यापार है। इसका आशय यह कतई नहीं कि जीवन विचारशून्य है या मनुष्य का विचार से कुछ लेना-देना नहीं। जब वे दुनिया जीने और मरने के लिए अच्छा बनाने की बात करते हैं तो यह बात अपने आप में एक अच्छा विचार है। वह लेखक के स्वभावतः प्रगतिशील होने की बात इसीलिए करते हैं। जीवन की आलोचना की बात इसीलिए करते हैं। लेखक के जीवन की आलोचना की बात भी करते हैं। लेखक की दृष्टि की बात करते हैं-‘‘ हमें सुंदरता की कसौटी बदलनी होगी। अभी तक यह कसौटी अमीरी और विलासिता के ढ़ंग की थी। हमारा कलाकार अमीरों का पल्ला पकड़े रहना चाहता था, उन्हीं कह कद्रदानी पर उसका अस्तित्व अवलंबित था और उन्हीं के सुख-दुख, आशा-निराशा, प्रतियोगिता और प्रतिद्वन्दिता की व्याख्या कला का उद्देश्य था। उसकी निगाह अंतःपुर और बंगलों की ओर उठती थी। झोपड़े और खंडहर उसके ध्यान के अधिकारी न थे।’’ प्रेमचंद, जाहिर है कि लेखक की प्रगतिशीलता की परीक्षा भी करते हैं। वे जिस लेखक नाम की संस्था को स्वभावतः प्रगतिशील कहते हैं, उस लेखक नाम की संस्था के भीतर मौजूद खतरों की ओर भी इशारा करते हैं और बताते हैं कि कैसे कोई लेखक अप्रगतिशील भी हो सकता है। आज भी यह खतरा टला नहीं है। प्रगतिशीलता की सुपरफास्ट गाड़ी के बावजूद गैर प्रगतिशीलता की यह मालगाड़ी नई दिल्ली जंक्शन से बदस्तूर चलती चली जा रही है। श्रृंगारिकता और विलासिता का घराना अपनी गायकी में उसी तरह तल्लीन है, पर प्रेमचंद के ठीक पहले के समय में जहाँ यह मुख्यधारा  थी, वहीं अब यह सूखकर एक मामूली पनाले में तब्दील हो चुकी है। प्रेमचंद के सामने अपने सामने की दुनिया को बेहतर बनाने की बेचैनी में दरअसल अपने देश को, अपने समाज को और अपने समय के साहित्य को भी बेहतर बनाने की बेचैनी शामिल है। प्रेमचंद को पता है कि लेखक की असल कर्मभूमि साहित्य है। प्रेमचंद कहते हैं कि ‘‘ जिन्हें धन-वैभव से प्यारा है, साहित्य-मंदिर में उसके लिए स्थान नहीं है।...हमारी परिषद ने कुछ इसी प्रकार के सिद्धांतों के साथ कर्मक्षेत्र में प्रवेश किया है। साहित्य का शराब-कबाब और राग-रंग का मुखापेक्षी बना रहना उसे पसंद नहीं। वह उसे उद्योग और कर्म का संदेश-वाहक बनाने का दावेदार है। उसे भाषा से बहस नहीं। आदर्श व्यापक होने पर भाषा अपने आप सरल हो जाती है। भाव-सौंदर्य बनाव-सिंगार से बेपरवाही दिखा सकता है। जो साहित्यकसा अमीरों का मुँह जोहने वाला है, वह रईसी रचना-शैली स्वीकार करता है, जो जन-साधारण का है, वह जन-साधारण की भाषा में लिखता है।’’ प्रेमचंद यहाँ साफतौर पर साहित्य की संप्रेषणीयता पर विचार कर रहे होते हैं। जाहिर है कि उनके सामने साहित्य की पहुँच का बड़ा प्रश्न है, लेकिन प्रेमचंद बड़े लेखक हैं इसलिए वे शुरू में ही बता देते हैं कि साहित्य की भाषा ठीक वही नहीं हो सकती है जो बोलचाल की भाषा है-‘‘ भाषा साधन है, साध्य नहीं।...भाषा बोलचाल की भी होती है और लिखने की भी।...मेरा अभिप्राय यह नहीं कि जो कुछ लिख दिया जाय, वह सब साहित्य है। साहित्य उसी रचना को कहेंगे, जिसमें कोई सचाई प्रकट की गयी हो, जिसकी भाषा प्रौढ़, परिमार्जित और सुदर हो और जिसमें दिल और दिमाग पर असर डालने वाला गुण हों और साहित्य में यह गुण पूर्णरूप में उसी अवस्था में उतपन्न होता है, जब उसमें जीवन की सचाइयां और अनुभूतियां व्यक्त की गयी हों।’’ इसीलिए अंत में भी प्रेमचंद कहते हैं कि ‘‘हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव, सौंदर्य का सार हो, सुजन की आत्मा हो, जीवन की सचाइयों का प्रकाश हो-जो हममें गति और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं, क्योंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।’’ सवाल यह कि आज प्रेमचंद जैसा खरापन कहाँ है ? क्या लेखक संगठनों के पास और उसमें शामिल कच्चे-पक्के प्रगतिशील लेखकों के पास प्रेमचंद का ईमान है ? क्या वे लोग सचमुच रचना और आलोचना और जीवन में रईसी-शैली से मुक्त हैं ? ये आलोचकों के पीछे-पीछे भागना, उनकी पूजा करना, उनसे सर्टिफिकेट लेना, सेठों और सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं के पुरस्कारों के पीछे-पीछे भागना जनता के लेखक का काम है या रईसी-शैली के लेखकों का काम है ? पहले की अशर्फियों और आज के पुरस्कारों में कोई बहुत अंतर नहीं है। क्या ऐसे ही लेखक दुनिया को बेहतर बनाने का काम करेंगे, जो अपनी उपलब्धियों के लिए मरे जा रहे हैं ? क्या ऐसे लेखक प्रगतिशील हैं जो यौन-संदर्भों को चटखारे के लिए लिखते हैं और अतिश्रृंगारिक कथा की पत्रिका में छपने के लिए लालायित रहते हैं ? सब जानते हैं कि ऐसी कहानियों का छापाखाना प्रेमचंद के नाम पर कथापत्रिका का धंधा करने वाले किस बुजुर्ग लेखक के पास है। प्रेमचंद का विपुल कथासाहित्य कया आज के कथाकारों और कथासंपादकों के लिए प्रमाण नहीं है कि प्रगतिशील कथा का परिसर किसे कहते हैं ? असल में प्रेमचंद के सामने साहित्य का उद्देश्य कुछ और था और आज के लेखकों के सामने साहित्य का उद्देश्य कुछ और है। प्रेमचंद के सामने बेचैनी का सबब रचना और अपने समय का तीखा यथार्थ था, बदलाव की आकांक्षा आत्मा को मथती थी। आज तो लेखक प्रगतिशीलता की आड़ में यश, इनाम, चर्चा का धंधा करने में लगे हैं। प्रेमचंद देश और समाज को देखते थे, ये अपने आप को देखते हैं, अपना तमगा, अपना नाम और अपना सर्टिफिकेट देखते हैं। यह बेहद तकलीफदेह है कि बकौल प्रेमचंद जिनके ऊपर अपने समय के समाज को जगाने की जिम्मेदारी है, सो रहे हैं। विडम्बना यह कि ये सोने वाले जिन्हें हिंदी का जगाने वाला बनना था, नींद में अमरता का स्वप्न देख रहे हैं। ये खुली आँखों से स्वप्न देख रहे हैं कि अमुक आलोचक और अमुक संपादक और अमुक इनाम उन्हें अमर बना रहा है, उन्हें हिंदी कथा साहित्य या कविता या आलोचना का हीरो बना रहा है। क्या पानी के बुलबुले जैसी नायकत्व की यह आकांक्षा अच्छी रचना या आलोचना को जन्म दे सकती है ? प्रेमचंद जैसी रचना की बात करते हैं, वह इन कमजोर हाथों से संभव है ? ऐसे ही लेखक समाज को बेहतर बनाने का जीवित स्वप्न पाठकों की आँखों में भर सकते हैं ? ऐसे लेखक पाठकों के लेखक बन सकते हैं ? क्या यह बताने की बात है कि प्रेमचंद आलोचकों के लेखक हैं या पाठकों के ? पाठकों की जगह आलोचकों और संपादकों की पूजा करने वाले लेखक कभी भी हिंदी के सच्चे लेखक हो ही नहीं सकते हैं। पुरस्कार बड़ा लेखक नहीं बनाता है, पाठक बड़ा लेखक बनाते हैं। पाठकों के लिए लिखी गयी रचना ही बड़ी रचना बनती है। पाठक ही समाज है। आज हिंदी के परिसर से पाठक गायब हैं। कुछ हैंे जो कविता-कहानी-आलोचना लिखते हैं और कुछ किताब और पत्रिकाएँ खरीद लेते हैं, बाकी पुस्तकालयों की शोभा की चीज हैं। कभी नाव पर रखकर पत्रिकाएँ और किताबें गाँव में पहुँचती थीं, प्रेमचंद घरों में पढ़े जाते थे। आज का दृश्य क्या वही है ? पाठकों की शक्ति पर भरोसा न करने वाले या पाठाकों की अभिरुचि को उन्नत न करने वाले लेखक समाज को बेहतर बनाने का स्वप्न जनता के दिल और दिमाग में पहुँचा सकते हैं ? कह सकते हैं कि आज राजनीति ने और व्यवस्था के इस मॉडल ने समाज को भ्रमित किया है, तो समाज को विचार और मूल्य से जोड़ने का काम किसका है ? राजनीति करने वालों का ? जनता को राजनीति के इस अँधेरे से निकालने का काम किसका है ? बिना आँख वालों को बिना आँख वाले खुली हवा में ले जाएंगे ? क्या राजनेताओं की तरह लेखकों ने जनता का विश्वास खो नहीं दिया है ? यह हमारे समय का बड़ा सवाल है ? इस सवाल से टकराना क्या आज लेखक संगठनों की जिम्मेदारी नहीं है ? शायद इस बड़ी कमी की वजह से ही आज साहित्य राजनीति से आगे नहीं है। प्रेमचंद ने जब कहा था-‘‘ साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफिल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है, उसका दरजा इतना न गिराइए। वह देश-भक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सचाई भी नहीं, बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सचाई है।’’ जाहिर है कि तब इस नसीहत की जरूरत जितनी थी, उससे कम आज नहीं है। आज भी महफिल सजाने और मनोरंजन का सामान जुटाने का काम लेखक बढ़-चढ़कर कर रहे हैं।  राजे-रजवाड़े नहीं हैं तो क्या हुआ राजनीति और साहित्य के राजे-रजवाड़े हैं। अपने को गिराने की ऐसी होड़ शायद अशर्फियों के जमाने में भी इतनी न रही होगी। क्या यह प्रगतिशील लेखकों और लेखक संगठनों के लिए गौरतलब नहीं है ? प्रेमचंद के स्मरण का अर्थ आज और क्या हो सकता है।
(यह लेख ‘पीपुल्स समाचार’ के 31 जुलाई 2013 के अंक में भी है।)






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