रविवार, 28 अप्रैल 2013

लेखक का जीवन

-गणेश पाण्डेय

पहली बात: अजीब आदमी हूँ। कहीं भी कुछ कहने लगता हँू। साहित्य का दारोगा हूँ कि चौकीदार ? क्यों नहीं उन्हें कुछ भी कहने देता हूँ। मुक्तिबोध ने भी तो कहा कि ‘कहने दो उन्हें जो यह कहते हैं’। मैं भी कहाँ कुछ कह रहा हूँ। किसे फुरसत है जो इस तरह की बेमतलब बात सुनेगा। सब अपने-अपने ‘‘कीर्ति यश रेशम पूनों की चाँदनी..’’ के लिए विकल हैं। संदर्भ दूसरा है पर मुक्तिबोध की कविता यहाँ भी अपना काम कर रही है-
सूखे हुए कुओं पर झुके हुए झाड़ों में
बैठे हुए घुग्घुओं व चमगादड़ों के हित
जंगल के सियारों और
घनी-घनी छायाओं में छिपे हुए
भूतों और प्रेतों तथा
पिचाशों और बेतालों के लिए-
मनुष्य के लिए नहीं-फैली यह
सफलता की, भद्रता की,
कीर्ति यश रेशम की पूनों की चाँदनी।
           यह मेरी कमी है कि मैं इस अंश को यहाँ साहित्य के पूँजीपतियों पर लागू करने की नासमझी कर रहा हूँ। पूँजीपति के अर्थ के साथ भी थोड़ा-सा अनर्थ कर रहा हूँ। यहाँ थोड़ी देर के लिए पूँजी को यश की पूँजी मान ले रहा हूँ। पूँजी पति के रूप में आज के प्रगतिशील और गैर प्रगतिशील, दोनों तरह के सफल लेखकों की जमात को देख रहा हूँ। इसी कविता की आरंभिक पंक्ति भी देना चाहता हूँ, यह कहने के लिए कि यहाँ भी लोग कुछ ऐसा ही कहते हैं-
तरक्की के गोल-गोल
घुमावदार चक्करदार
ऊपर बढ़ते हुए जीने पर चढ़ने की
चढ़ते ही जाने की
उन्नति के बारे में
तुम्हारी ही जहरीली
उपेक्षा के कारण, निरर्थक तुम व्यर्थ तुम!!
    मित्रो, कहना यह है कि गोल-गोल घुमावदार चक्करदार सीढ़ी से ऊपर न चढ़ने की जिद की कीमत हर दौर के लेखक चुकाते हैं। जैसे आज अच्छे और बुरे दोनों तरह के लेखक हैं, ऐसे ही तब भी थे। अलबत्ता तब सफलता के लिए अपनी आत्मा का सौदा करने वाले लेखक शायद कुछ कम रहे होंगे। आज लेखक ‘कीर्ति यश रेशम की पूनों की चाँदनी’ के लिए किसी भी सीमा तक नंगा हो जाने के लिए सहर्ष प्रस्तुत है। जैसे पहले राजनीति और साहित्य में कुछ समानताएँ थीं, आज भी कुछ समानताएँ हैं। मुक्तिबोध के समय में देश की बागडोर संभालने के लिए लोकसभा का चुनाव लड़ना पड़ता था, साहित्य में महत्वपूर्ण रचना होता था। आज जैसे जनता के बीच जाकर चुनाव लड़े बिना आप देश की बागडोर संभाल सकते हैं, उसी तरह साहित्य में महत्वपूर्ण काम किये बिना किसी भी संस्था का प्रधान बन सकते हैं, कोई भी पुरस्कार अपने नाम कर सकते हैं। बस आपके पास प्रतिभा हो या न हो, गोल-गोल घुमावदार-चक्करदार सीढ़ी पर चढ़ने की कला जरूर हो। आपके हाथ में कलम या लाठी हो या न हो, बैसाखी जरूर हो। साहित्य में कई तरह की सीढ़ियाँ हैं। संगठन आज के जमाने की बड़ी मजबूत सीढ़ी है। किसी भी लेखक संगठन में घुस कर देख सकते हैं। जो संगठन में न घुसना चाहें, उनके लिए गोरखपुर में हैंडलूम की बनी पिस्तौलछाप धोती है। उसमें घुस कर भी कई तरह की सफलता पा सकते हैं। जैसे ही आपने इन सीढ़ियों से दूर रहने का व्रत लिया तो इन सीढ़ियों के डंडे आपको दौड़ाने लगेंगे। रहने नहीं देना चाहेंगे, साहित्य के परिसर में। ये आपके प्राण लें या न लें, पर इनका पहला वार सीधे आपके स्वाभिमान पर होगा। इनके लिए एक लेखक का जीवन साफ-सुथरा होना गैर जरूरी है, गैर जरूरी क्या, कहें कि बकवास है। असल में ये चाहते हैं कि किसी के पास इज्जत-विज्जत नाम की कोई फालतू चीज रह ही न जाय। इनके स्वाभिमान और स्वच्छ जीवन लेखक के लिए नहीं है, सिर्फ नेताओं के लिए है। नेता हरगिज भ्रष्ट न हों, यें हो सकते हैं। क्योंकि इन्होेने अपने लिए भी कुछ विशेषाधिकार बना रखा है। अव्वल तो कोई इनके जीवन को रचना के बरक्स रखकर न देखे, दूसरे इन्हें भ्रष्ट न कहे।
    मित्रो, अब तो ऐसे-ऐसे तर्क ढ़ूँढ कर लाये जा रहे हैं कि आप हिम्मत न जुटा पायें उन्हें बुरा कहने के लिए। बस वे आपको बुरा कहते रहें कि आप कामयाब नहीं हुए तो अपनी बेवकूफी से। किसने कहा था कि अच्छा लिखने के लिए, साहित्य के जीवन को साफ-सुथरा रखें। वे तो खुले आम कहते हैं कि अच्छा लिखने के लिए अच्छा जीना जरूरी नहीं। एक भ्रष्ट लेखक भी अच्छा लिख सकता है। इसलिए उसके जीवन को मत देखिए, उसके लिखे को देखिए। असल में वे यह समझते हैं कि वे जो कुछ भी लिख देंगे, सब अच्छा होगा। मैं अपनी नासमझी का क्या करूँ ? यह समझ ही नहीं पा रहा हूँ कि बुरा जीवन जीकर बहुत अच्छा लिखा जा सकता है। वे दुनिया भर के साहित्य का जिक्र करते हैं। मैं सोचता हूँ कि हिंदी के ऐसे सभी भ्रष्ट लेखकों के बारे में क्यों नहीं कुछ बताते, जिन्होेंने बहुत अच्छा लिखा है। सोचता हूँ कि पहले उन्हीं कवियों का नाम लूँ, जिन्हें वे भी बड़ा मानने से इंकार नहीं करते। कबीर, निराला और मुक्तिबोध कर ही नाम ले लूँ और पूछँू कि इनसे जुड़े भ्रष्टाचार के कितने मामले हैं ? साहित्य में कुछ लोगों के खुल्लम-खुल्ला भ्रष्टाचार प्रेम को देखकर दंग रह गया हँू। प्रश्न हैं कि बहुत बेचैन करते हैं। बुरा रहते हुए भला अच्छा कैसे लिखा जा सकता है ?
1- क्या आज की तारीख में भाजपा में शामिल होकर अच्छा लेखन या प्रगतिशील लेखन किया जा सकता है ?
2- कोई सनद मिल सकती है, जो वक्त पर काम आवे ?
3- क्या लेखक संगठनों से जुड़े प्रगतिशील मित्र उस लेखक का विरोध नहीं करेंगे ?
4- उसे या उसकी कृति को उतना ही सम्मान देंगे जितना अपने पक्ष या संगठन के लेखक को देंगे ?
5- बुरा जीवन जी कर हिंदी में बहुत अच्छा लिखने वाले बड़े लेखक अधिक हैं या अच्छा जीवन जीकर मूल्यवान रचने वाले ?
6-कोई छिपी हुआ एजेंडा तो नहीं है ?
7- कहीं कोई ऐसी शर्त तो नहीं बनायी जा रही है कि लिखने के लिए बुरा होना अनिवार्य शर्त है ?
  ये सात सवाल दरअसल मेरे लिए सात फाटक हैं, जो मुझे रोकते हैं। मुझसे कुछ कहते हैं। कहते तो ये उनसे भी हैं जो अघाये हुए लोग हैं। सीढ़ीवादी लोग हैं। आज हम जिस समय में हैं, यह जैसे रातनीति में निर्लज्जता का समय है, वैसे ही साहित्य में भी निर्लज्जता का समय है। तनिक भी शर्म नहीं है। ढ़ंग का लिखना तो दूर कुछ भी लिखा हो चाहे न लिखा हो, आप किसी का झोला ढ़ोकर झोलाछाप लेखक बन सकते हैं। कभी-कभी तो पुरस्कार छाप लेखक भी बन सकते हैं। कुछ मित्र लेखक संगठनों में हैं और साहित्य बघारने के लिए विकल रहते हैं। कुछ अच्छे लोग भी अपवाद के रूप में हो सकते हैं, पर अधिकांश बेईमान लोग हैं। यहाँ मैं साहित्य के ईमान की बात कर रहा हँू।
  जो लोग आज कह रहे हैं कि अच्छा साहित्य लिखने के लिए अच्छा जीवन जरूरी नहीं है, दरअसल वे लोग अपने लिए भागने का रास्ता बनाना चाहते हैं। वे साहित्य से आत्मसंघर्ष की लंबी परंपरा को ही मिटा देना चाहते हैं। वे लेखक को एक मशीन बना देना चाहते हैं। जो व्यक्तित्वहीन रहकर सिर्फ बिकने के लिए उत्पाद बनाये। हिंदी में अभी भ्रष्ट लेखकों से उत्तम कृतियों की जानकारी और लोगांे को नहीं है, उन्हें हो तो कह नहीं सकता। मैं यह नहीं कहता हूँ कि सब महान ही रचें। क्या यह जरूरी है कि सब महान रचें ? रचना आपकी आंतरिक विवशता है या पुरस्कार और यश की आकांक्षा ? दिक्कत यहाँ है। ऐसे भी लिखने वाले हैं जो मानते हैं कि अपनी बात कहना जरूरी है। एक ड्यूटी है। क्या चौकीदार बेईमान होगा तो रखवाली अच्छी तरह कर पायेगा ? जो लेखक खुद गंदा होगा वह गंदगी दूर करने की बात कितनी ताकत से कर पायेगा ? सवाल यह है कि आप गंदगी दूर करने के लिए साहित्य में आये हैं या गंदगी करने के लिए ? यह एक मुश्किल सवाल है। सच तो यह कि आज सफलता की कीमत चुकाना सबके वश की बात नहीं।
      दूसरी बात: मैं जब अच्छा-अच्छा कहता हूँ तो इसका अर्थ यह नहीं कि इतना अच्छा होना कि भगवान होना। लेखक का जीवन इकहरा नहीं होता है। उसका एक जीवन उसके परिवार से जुड़ा होता है, जहाँ वह पिता, पति, पुत्र, भाई आदि रिश्तों का धर्म निभाता है। उनके लिए जीवन में समझौते भी करता है। सच तो यह कि वह जीवन वह उनके लिए जीता है। उनके भरण-पोषण के लिए मन मारकर दस तरह के काम करता है। लेकिन जैसे ही वह जीवन भी सात पीढ़ियों के लिए संचय में बदलता है, भ्रष्ट हो जाता है। उसके उद्देश्य बदल जाता है। सिर्फ जीने के लिए नहीं, विलासिता और अकूत पूँजी खड़ी करने का पथ हो जाता है। यह रास्ता लेखक का रास्ता नहीं रह जाता है। लेखक का जो दूसरा जीवन होता है, वह साहित्य के परिसर से जुड़ा होता है। जिसमें सिर्फ और सिर्फ लेखक, संपादक, आलोचक और प्रकाशक और पाठक होते हैं। जैसे नेता का चेहरा जनता के सामने होता है, उसी तरह लेखक का चेहरा पाठक के सामने होता है। जैसे भ्रष्ट नेता विकास का झूठा दावा करता है, उसी तरह भ्रष्ट लेखक पाठक के सामने अपनी रचना और जीवन के जरिये झूठे दावे करता है। साहित्य का भ्रष्टाचार मुख्य रूप से मूल्य से जुड़ा होता है और राजनीति का भ्रष्टाचार मुख्य रूप से पैसे से जुड़ा होता है। राजनीति में जो स्थान कुर्सी का है, साहित्य में वही स्थान पुरस्कार और साहित्य की संस्थाओं के पद का है। एक लेखक अपने पहले वाले और दूसरे वाले जीवन के बीच एक संतुलन बनता है। लेखक साहित्य मे जैसे ही अपनी कमजोर रचना पर भारी पुरस्कार की आकांक्षा से संचालित होता है, तुरत भ्रष्ट हो जाता है। थोड़ी देर के लिए यश को एक जरूरी तत्व मान लें तो भी कहना यह कि यश तो अच्छी रचना के लिए होता है, फिर आप खराब रचना पर यश क्यों चाहते हैं ? अर्थात यश तो उा अच्छा रचने वाले की चीज हुई जिसे आप संपादक और आलोचक की सांठगांठ से पाठक को धोखा देकर प्राप्त करना चाहते हैं, जैसे एक खराब नेता साड़ी और पाउच की रिश्वत देकर वोट खरीदता है उसी तरह एक लेखक अपने स्वाभिमान को ताक पर रखकर दस तरह से आलोचक और संपादक को खुश करके प्राप्त करता है। हर शहर में पुरस्कार बाँटने वाले हिंदी के कापुरुषों की कृपा प्राप्त करके पुरस्कृत होता है। ऐसे-ऐसे पुरस्कार देने वाले होते हैं जो पुरस्कार का धंधा करते हैं। विद्यार्थियों को पानी वाला गोल्डमेडल, डॉक्टरों और व्यापारियों आदि को नगरगौरव या श्रमवीर आदि सम्मान के साथ लेखकों के भी सम्मान का धंध करते हैं। कई प्रोफेसर भी साहित्य के इस सबसे गंदे धंधे में शामिल होते हैं। कहना यह है कि इस तरह के रास्ते पर चल कर चर्चा और पुरस्कार इत्यादि के लिए दिल्ली और दूसरे शहरों की गोल-गोल और घुमावदार-चक्करदार सीढ़ियों पर दिनरात उछलना साहित्य का भ्रष्टाचार है। यहाँ तक भी होता तो शायद लोग आँख मूँद लेते। लेकिन ऐसे रास्तों पर चल कर ईमानदारी से साहित्य में काम करने वाले लोगों के सिर पर, छोटे बच्चों की तरह किसी की गोद में बैठ कर ऊपर से सू-सू करना हरगिज-हरगिज बर्दाश्त करने के लायक नहीं है। भाई जाओं तुम फलाना जी के साथ उनके ड्राइंगरूम में कुछ भी करो। बाहर आकर हेकड़ी क्यों दिखाते हो। पुरस्कार की मदिरा पीकर हल्ला-दंगा मत करो, जाओ चुपचाप अपने घर में सो जाओ। लेकिन धोतियों पाजामों और पतलूनों की कृपा से प्राप्त व्याघ्रचर्म ओढ़कर अपनी उम्र के बाकी लेखकों के सामने शेर बनोगो तो दूसरा उस चर्म को तुम्हारी चमड़ी से अलग भी कर सकता है। फर्जी ढंग से ही सही, चलो ले जाओ पुरस्कार, पर जिन्होंने तुम्हारी तरह दिल्ली की धोती से लेकर गोरखपुर की धोती तक की परिक्रमा नहीं की है, अपनी उम्र के उन समकालीनों को कभी बहुत छोटा समझोगो या कभी अपमानित करोगे तो तुम्हारा फर्जी सम्मान कितनी देर तक टिकेगा ? ऐसे पुरस्कार लेने और देने वालों को सारा काम बिना किसी शोर-शराबे के करना चाहिए। कोई कुछ नहीं कहेगा। कहना तो यह है कि यह सब साहित्य का बचपना है। बच्चे सचमुच का जहाज नहीं चला सकते। कागज की या प्लास्टिक की जहाज चलाते हैं। उसी तरह इस बचपने से ऊपर न उठने वाले लोग कैसे अच्छा रचेंगे ? कैसे सचमुच की बड़ी रचना संभव करेंगे ? पहले तो उन्हें अपने पैरों को मजबूत करना है। सहित्य में संपादक, आलोचक और प्रकाशक के गठजोड़ ने हिंदी में एक शर्मनाक स्थिति पैदा कर दी है। बहरहाल, कहना यह कि बुरे जीवन से अच्छी रचना का सिद्धांत देने वाले राजधानी के लेखक या लेखकनुमा लोग अपनी समझ अपने पास रखें। जो साहित्य में कुछ टूटा-फूटा अपने ईमान को साथ लेकर करना चाहते हैं , उन्हें करने दें। अपने काम पर बहुत अभिमान हो तो कभी दूसरों के काम से अपने काम को मिलाकर भी देख लें। शायद हिंदी में भ्रष्टाचार के पक्ष में फतवा जारी करने की फजीहत से बचने में मदद मिले।
  तीसरी बात: हिंदी का लेखक समाज बहुत डरा हुआ समाज है। इतनी डरी हुई तो किसी शहर की जनता भी नहीं है। असल में दिक्कत यह है कि सचमुच के लेखकों की जगह इधर नकली लेखकों का प्रादुर्भाव हुआ है। जैसे असली समाजवादी, असली मार्क्सवादी और दूसरी विचारधारा के असली लोगों की जगह ज्यादातर नकली लोग जहाँ-तहाँ बैठे हैं, उसी तरह साहित्य में भी है। नकली लेखकों की एक पूरी फौज है। किसी को विश्वास न हो तो यहाँ देखने के लिए पधारें। ये नकली लेखक अपने आकाओं से बहुत डरते हैं। इनके आका किसी भी विचारधारा के हो सकते हैं। कोई जरूरी नहीं कि वे असली लेखक हों। असली होगे तो नकली के साथ रहेंगे कैसे  ? बहरहाल ये नकली लेखक किस हद तक डरते हैं, यह बता कर अपनी बात खत्म करूँगा। मेरे एक आलोचक मित्र हैं, जिनसे नेट और फोन पर लंबी बातचीत होती है। मैं उनका नाम इसलिए नहीं ले रहा हूँ कि यह एक व्यक्तिगत बातचीत का हिस्सा है, इसलिए उनका नाम लिए बगैर  एक छोटा-सा अंश-सिर्फ दो पंक्ति- उद्धृत करूँगा-‘‘ आपके लेखन में मूल नक्षत्र का दबदबा है इसलिए लोगों को बातें आसानी से नहीं पचतीं। जो लोग आपको पसंद भी कर रहे होते हैं, वे इस डर से आक्रांत रहते हैं कि ये शख्स कहीं मुझे ही किसी दिन न नाप दे।’’ क्षमा कीजिएगा मित्र कि आज दो पंक्ति सबसे साझा कर रहा हूँ। सिर्फ यह बताने के लिए कि मैं तो कुछ भी नहीं हूँ, न राजधानी की किसी बड़ी संस्था का अध्यक्ष, न राजधानी का कवि-आलोचक, न राजधानी का संपादक, फिर भी साहित्य के कुछ बुरे लोग मुझसे डरते हैं। डरना इस रूप में कि अमुक जी यह देख न लें कि मेरे साथ हैं। फलाना जी नाराज हो गये तो हाय दिल्ली या कहीं और के कार्यक्रमों में कैसे बुलाया जाऊँगा। कोई पुरस्कार कैसे मिलेगा। ये इतने डरे हुए लोग हैं कि साहित्य की सत्ताओं से टकराने वाले साहित्य के मुझ जैसे बहुत छोटे से कार्यकर्ता से हजार किलोमीटर दूर रहना पसंद करते हैं। नये लेखक तो नये हैं, पुराने भी इसी वजह से दूर रहना पसंद करते हैं। मेरी उम्र के आसपास के कुछ लेखक और एक तो बड़े भारी संपादक हैं, वे डर कर दूर रहते हैं कि फलाना जी कहीं नाराज न हो जाएँ। मित्रो, यह व्यक्तिगत प्रसंग सिर्फ यह कहने के लिए कि जब मुझसे इतना डर है तो ये डरने वाले लोग साहित्य के बड़े-बडे़ लोगों से कितना डरते होंगे, आप सहज समझ सकते हैं। दूसरी बात साफ कर दूँ कि कुछ लोग ऐसे जरूर हो सकते सकते हैं जो मेरे लिखने की वजह से डरते हों, पर ऐसे लोग सिर्फ और सिर्फ बुरे लोग होंगे। अच्छे लोग मेरे लिखने से डरते नहीं बल्कि उसके साथ होते हैं। क्योंकि मेरी बात मेरी बात है ही नहीं, सबकी बात है।              
     मित्रो आज सबसे बड़ी दिक्कत वाम के डरे हुए कवियों और लेखकों की है। वाम के बेहद ईमानदार सक्रिय कार्यकर्ता तो बहुत मिल सकते हैं। कई को जानता हूँ। पर लेखकों में मिलेंगे भी तो बहुत कम मिलेंगे। मैं पहले भी कह चुका हूँ कि वाम को साहित्य में सिपाही का पक्ष मानता हूँ। इसीलिए कहता हूँ कि चोर को बाद में पकड़ेंगे, पहले सिपाही की तलाशी लो। मैं कोई बहुत अच्छा आदमी नहीं हँू, कुछ कमियाँ मुझमें भी जरूर हांेगी। बच्चों के लिए मुझे भी समझौते करने पड़े होगे। पर साहित्य में हरगिज नहीं। साहित्य मेरे लिए यश का पथ नहीं है। मेरी आंतरिक विकलता है। मेरा एक और जीवन है, जिसमें पहले के जीवन के टूट-फूट को ठीक करने की कोशिश करता हूँ। अंत में अपनी कविता-‘‘बुरा यह कि मैं कम बुरा हुआ’’ का यह अंश-
बुरा यह
कि मैं कम बुरा हुआ
किसी स्त्री से कुछ न छिपाया
किसी का दिल न दुखाया
किसी बच्चे से छल न किया
और बच्चे की मां को छोड़कर
कहीं और गया नहीं
उस स्त्री से पूछने भी नहीं गया
कि उसने मेरा दिल क्यों दुखाया
यह सोच-सोच कर
मेरा हाल और बुरा हुआ
कि उस वक्त कहां था कमबख्त मैं
जब बंट रही थी बुराई
बेहिसाब...



2 टिप्‍पणियां:

  1. साहित्य जगत की दुर्दशा पर एक बार फिर आपने कलम उठाई, धन्यवाद. सचमुच यह दौर बेचैन करने वाला है. लेकिन हस्तक्षेप का नतीजा सामने आएगा. जो बचे हैं, वे तो बचे रहें. मुक्तिबोध ने यह भी तो कहा है-
    "तुम्हारे पास, हमारे पास,
    सिर्फ़ एक चीज़ है –
    ईमान का डंडा है,
    बुद्धि का बल्लम है,
    अभय की गेती है
    हृदय की तगारी है – तसला है
    नए-नए बनाने के लिए भवन
    आत्मा के,
    मनुष्य के,
    हृदय की तगारी में ढोते हैं हमीं लोग
    जीवन की गीली और
    महकती हुई मिट्टी को।"

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  2. बेहद अच्छा लेख है। इसे सभी लेखकों को पढ़वाने की ज़रूरत है। निजी रूप से सबको इस पर मनन करना चाहिए। लेकिन अब ज़माना वो नहीं रहा। शायद ही कोई आपकी बात से सहमत होगा। और जो सहमत हैं, वे पहले ही इस दौड़ से बचे हुए हैं, जैसे मैं।

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