सोमवार, 2 जनवरी 2012

रचयिता के पैर

 - गणेश पाण्डेय 

एक साधारण कवि की दुनिया में
और क्या हो सकता था भला उसका
एक जोड़ा कामचलाऊ पैर के सिवा
कवि की क्षीण काया में
पैर ही तो था जो हर मुश्किल में
उसका था
और बची हुई थी जिसमें
शुरू से अंत तक
किसी का अपना बने रहने की आदत
ये पैर
न किसी मैराथन धावक के पैर थे
न किसी फुटबाल के शीर्ष खिलाड़ी के
और न अकारण दिल तोड़ने वाली
तुनकमिजाज नृत्यांगना के पैर
फिर भी पता नहीं किसकी आंख में
किरकिरी बनकर चुभ रहा था
कवि का पैर
असंख्य बेवाइयों से विदीर्ण
एक फटे-पुराने जूते के चमड़े की तरह
अकोमल और असुंदर पैर
पता नहीं किसे
देखा नहीं गया
कैसा मोटरसाइकिल सवार था
कि जिसपर कुछ और सवार था
पता नहीं भाड़े पर दुर्घटना करता था
कि ऐसे ही शौकिया
कैसा बावला था
आव देखा न ताव
ठोंक दिया सीधे
डी.आई.जी. के बंगले के सामने
क्या पता
खुद डी.आई.जी. की साजिश रही हो
इस कांड में
या रहा हो किसी और अफसर का हाथ
बतायें नगर के गुणीजन
अपने जासूसों से पता करायें
डोमिनगढ़ के आलोचक और तांत्रिक
डोमानंद जी महाराज
आखिर
किसी को क्या खुन्नस हो सकती थी
हिन्दी के एक फटीचर कवि से
जो धंधा-पानी के लिए
पत्रिका नहीं निकालता था
न रुपया-पैसा खर्च करके
यश खरीदता था
और न लालबत्ती का रोब जमाकर
चर्चित होता था
झोला तो खैर बहुत से लेखक ढ़ोते थे
किसी न किसी का
ऐसे प्रश्नों के बारे तथागत मौन रहेंगे
कुछ न कहेंगे
बदकिस्मती यह कि दुर्घटनाग्रस्त कवि
जिलाधिकारी के बंगले के पिछवाड़े रहता था
और रोज शाम हवाखोरी के लिए
डी.आई.जी. के बंगले की तरफ जाता था
पता नहीं आगे क्या हुआ
एक संक्षिप्त कार्रवाई में
कवि को टूटे हुए पैर के साथ
बिस्तरपर
तनहाई की कारा में डाल दिया गया
ताकि जा न सके चंपा का रसिया कवि
अपने किसी मनपसंद बगीचे में
कविता के खेत-खलिहानों
घर-आंगन और चौपालों में पहुंच न सके
कविता का दीवाना
कलेक्टर बहादुर के दफ्तर के सामने
धरने पर बैठी स्त्रियों से रहे दूर
पशु-पक्षियों और हवाओं
और यहां तक कि मासूम तितलियों से
कर न सके कोई बात
हरगिज-हरगिज जा न सके
कविता के इलाके में
जाने कैसा सवार था
तनिक-सा सोचता तो अधिक पा जाता
जो कवि के साथ पैर कांड करने की जगह
सीधे पैर ले जाता
बिना किसी अंतरिक्षयान के
एक चांद को दूसरे चांद से मिलाता
जीवन के नये क्षेत्रों में अपने लिए
जगह बनाता
मुश्किल रास्तों पर चलना सीख जाता
क्या पता उस्तादों ने दी हो उसे
सिर्फ पैर कांड की तालीम
कि उसने छुआ नहीं कोई और अंग
चुना भी तो बस एक पैर
कि कर दो इसे जाम
पता नहीं कहां था नौजवान सवार का ध्यान
जो अपना भारी किया नुकसान
छोड़ दिया
कवि की दरिद्र देह में छिपा अनमोल खजाना
दिल के तहखाने में उतर भर जाता
तो हो जाता मालामाल
जगह-जगह से चुराकर लाये गये
एक से एक नायाब हीरे-जवाहरात जैसे
मुखड़े
मधुमक्खी के छत्ते  की तरह
जीवनरस में सने
कोई मुश्किल न होती कवि को
किसी नौजवान को देने में अपना दिल
क्यों कि कवि के साथ नहीं रह गया था
उसका दिल-
लो नौजवान ले जाओ
फबता है तुमपर खूब यह जवान दिल
कहने को कवि के साथ रहता था हाथ
पर करता था सदा औरों का काम
चलता था बच्चों के साथ-साथ
उठता था
नन्हे-नन्हे दांतो के वास्ते तोड़ने के लिए
आम,अमरूद,जामुन और लीची के गुच्छे
फैलता था
एक नये देश और नये समाज को
बाहों में भरने के लिए
बच्चों की दुनिया थोड़ी और चौड़ी
धरती थोड़ी और उर्वर करने के लिए
सबके लिए किताबें , अनाज , दूध , सब्जियां
गैस का सिलेंडर और पूरा कुनबा ढ़ोते रहे
हाथ
लगे रहे सबके लिए
आसमान से तारे तोड़ने के काम में
जीवन भर दूसरों के हजार काम करने वाले
कवि के कोमल हाथ
अपनी पत्नी के लिए कभी ला नहीं सके
एक लाल गुलाब
यह रहस्य कविता का विषय नहीं
बाकायदा जांच का मुद्दा है
पर जब हिंदी के कुछ कवियों को
मार दिये जाने की घटनाओं की जांच हुई नहीं
तो ऐसे किसी मामूली कांड की जांच
क्या खाक होगी
आखिर
इस पैर कांड के पीछे के हाथों ने
बख्श क्यों दिया इन हाथों को
क्यों नहीं दी कवि का हाथ होने की सजा
और तो और
ठोंकने वाले ने क्यों किया
कविता की जासूस आंखों को अदेख
रहने दिया पापी आंखों को जस का तस
दूसरों की सुंदरता में सेंधमारी करने के लिए
डाका डालने के लिए दूसरों के खजाने पर
भोलाभाला नौवजवान सवार भला क्या जाने
कवियों की आंखों में छिपा होता है
जीवन की कविता का घर
इस पैर कांड को अंजाम देने वाला नौजवान
भला कैसे जान पाता
कि उससे हजार गुना ज्यादा
शातिर और खतरनाक है कवि का दिमाग
जिसमें एक साथ बैठे रहते हैं-
कवि , व्यभिचारी , चोर और क्रांतिकारी
हर समय लगा रहता है-
कविता की दुनिया में तख्ता पलटने के लिए
दुनिया को फिर से रचने के लिए
कुछ का कुछ करने के लिए
और अपने जैसे
गरीब दोस्तों को कविता सुनाने के लिए
पता नहीं कैसे हुई यह चूक ठोंकने वाले से
जो उसके निशाने पर थे कवि के पैर
ये पैर थे जो ले जाते थे कवि को हर मुश्किल में
आगे
जहां भी फटा हुआ देखते थे अड़ जाते थे
ये पैर उम्मीद के रास्ते पर चलने वाले पैर थे
ये पैर दुनिया में प्यार की जीत के पैर थे
ये पैर रचयिता के पैर थे
हर अंधेरे को चीरकर देखते थे ये पैर
ये पैर कविता के पैर थे।

(‘जापानी बुखार’ से)


                                               

2 टिप्‍पणियां:

  1. जो धंन्दा - पानी के लिए पत्रिका नहीं निकालता था ........
    कवि की दरिद्र देह में छुपा अनमोल खजाना ......
    बेहतरीन कविता
    धन्यवाद ||

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    1. कविता आखिर क्यों ? जैसे प्रश्न को चिन्हित करती कविता. धन्यवाद पाण्डेय जी.

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